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Thursday, 9 April 2020

फसल चक्र

नमस्कार। मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आज हम फसल चक्र के बारे में जानकारी साझा कर रहे हैं। 

फसल चक्र क्या है? 
 फसल रोटेशन खेत के विभिन्न क्षेत्रों में फसल बोने की एक तकनीक है, जहाँ एक ही खेत में साल-दर-साल अलग-अलग फसलें उगाई जाती हैं। ताकि मिट्टी में अच्छे गुणों को संरक्षित किया जा सके और मिट्टी स्वस्थ और उपजाऊ बनी रहे। इसे फसल चक्र कहा जाता है।



फसल चक्र के सिद्धांत
 1 रेशेदार जड़ प्रणाली के साथ पालन किया जाना चाहिए। यह मिट्टी से पोषक तत्वों के उचित व समान उपयोग में मदद करता है।  
2. फलीदार फसलें को गैर-फलीदार फसलों के बाद उगाई जानी चाहिए।  फलियां मिट्टी को अवशोषित करती हैं और अधिक अकार्बनिक सामग्री जोड़कर मिट्टी में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ठीक करती हैं। 
 3. कम विस्तृत फसलों के बाद अधिक विस्तृत फसलों का पालन करना चाहिए।
 4. एक आदर्श फसल रोटेशन वह है जो परिवार के खेत श्रम को अधिकतम रोजगार प्रदान करता है, कृषि मशीनरी उपकरण कुशलता से उपयोग किया जाता है।  
 5.  चयनित फसलों को मिट्टी और जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।
6. फसलों का चयन किसान की वित्तीय स्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। 

 फसल रोटेशन के लाभ
 • मृदा उर्वरता को वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ठीक करके बहाल किया जाता है।
• मृदा भौतिक-रासायनिक गुणों में सुधार तथा गतिविधि को प्रोत्साहित करती है।
• विषाक्त पदार्थों के संचय से बचा जाता है।  
• मृदा को क्षरण से बचाया जाता है। 
• कीटों और बीमारियों को नियंत्रित करता है।
• खेतों में खरपतवारों को नियंत्रित करता है। 
• मृदा की उर्वरता को बढ़ाता है और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करते हैं। 
 • उथली और गहरी जड़ वाली फसलें मिट्टी से अलग-अलग गहराई पर पोषक तत्वों को ग्रहण करते हैं।  
• मृदा कीट जो पौधों के एक परिवार पर निशाना साधते  हैं, हर साल भोजन के स्रोत में बदलाव के रूप में बाधा बन जाते हैं।  
• फसल की पैदावार बढ़ाता है - यह पाया जाता है कि फसल रोटेशन से एक ही मौसमी फसल से प्राप्त फसल में वृद्धि होती है।  
• मिट्टी के पोषक तत्वों में वृद्धि- यह मिट्टी में विभिन्न पोषक तत्वों को जोड़ने या अवशोषित करने में मदद करता है।  
• वर्षा का प्रभाव जो पानी से मिट्टी के कटाव को कम करता है और पानी से सामान्य कटाव करता है क्योंकि पौधों की जड़ें मिट्टी की ऊपरी परत को एक साथ रखती हैं।




Tuesday, 7 April 2020

गन्ना : प्रमुख रोग व उपचार

नमस्कार। मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आज हम गन्ने की खेती में आने वाली मुख्य बीमारियों तथा उनके लक्षण व उपचार हेतु सहायक जानकारी साझा कर रहे हैं।

गन्ना 
गन्ना ग्रेमीनी कुल के अंतर्गत आता है। गन्ने की फसल को लगभग साठ प्रकार की बीमारियां संक्रमित करने के लिए को जाना जाता है।
इन रोगो का सीधा प्रभाव फसल के अंकुरण , बढ़वार पर पड़ जाता है। जोकि अलग अलग समय तथा अनुकूल परिस्थितियों में फसल को नुक्सान पहुंचा कर उपज में 20-25% की कमी हो सकती हैं। कृषक को इन बीमारियो के फसल पर होने वाले प्रभाव को कम करने के लिए  इन बीमारियो के बारे में जानकारी प्राप्त होना अनिवार्य है।

फंफूदी , जिवाणु , वायरस इन तीन प्रकार से उत्पन्न होते हैं तथा फसल को पानी , बीज और मृदा के माध्यम से प्रभावित करते हैं।जोकि पिछली फसल के अवशेषों से या अस्वस्थ गन्ना  बीज की बुआई से और खेत में पानी के ठहरने से फसल को संक्रमित करते हैं।
गन्ना फसल में आने वाली मुख्य बीमारियों व उनके लक्षण तथा बचाव हेतु उपचार के लिए की गई सिफारिशे आदि कृषक के लिए यह लेख साझा कर रहे हैं। जोकि निम्न प्रकार से है।
मुख्य रोग       -         रोग कारक

लाल सड़न  - कोलटोट्राइकम फाल्काटम ( फंफूदी)

विल्ट ( उटका रोग) - सिफैलो स्पोरियम (फंफूदी)

स्मट (कंडुआ रोग) - अस्टीलागो सिटामिनी (फंफूदी)

पोक्खा बोइंग - जीनस फ्यूजेरियम

ग्रासीय शूट - फाइटोप्लाज्मा (जिवाणु)

लाल सड़न ( रेड रॉट ) : यह गन्ने की बहुत ही घातक फंफूद जनक बीमारी है।  गन्ने का लाल सड़न कोलटोट्राइकम फाल्काटम वेंट फंफूदी जनक के कारण होता है। इसे गन्ने का कैंसर और गन्ने का काना रोग भी कहा जाता है।   जोकि गन्ने की फसल को बीज , मृदा और जल के ठहरने के कारण संक्रमित करते हैं। फंफूद जनक रोग गन्ने की फसल में आने पर पूरी फसल व प्रजाति को क्षति पहुंचाने के साथ ही शुगर की मात्रा को भी प्रभावित करता है।

लाल सड़न रोग के लक्षण :
• संक्रमित गन्ने की ऊपरी तीसरी-चौथी पत्ती सुखकर पीली पड़ने लगती है।
• संक्रमित गन्ने की पत्तियों पर लाल-भूरे रंग धब्बे पड़ जाते हैं।
• संक्रमित गन्ना आसानी से टूट जाता है।
• जब गन्ने को काटते हैं तो गन्ना अंदर से सड़ा हुआ निकलता है और उसमें से एल्कोहल और सिरके जैसी गन्ध आती है।
• यह जुलाई से फसल के अंत तक लगता है। और फसल को नुक्सान पहुंचाता है।

लाल सड़न रोग के उपचार हेतु :
• गन्ने के लाल सड़न बीमारी का कोई प्रभावी रोकथाम का इलाज नहीं हुआ है।
• रोगी पोधो के मेड़ को उखाड़ कर वहां ब्लिचिगं पाउडर डाल दिया जाना चाहिए।
• फसल चक्र अपना कर रोगरोधी किस्मों का चयन करें।
• स्वस्थ बीज का चयन कर बीज गन्ने के टुकड़ों को बावस्टिन के 0.25 प्रतिशत घोल में 30 मिनट तक डुबोकर बुवाई करना चाहिए।
• बीज गन्ने को आर्द वायु उष्मोपचार संयंत्र में 54 डिग्री से० पर 2.5 घटे तक उपचारित कर बुवाई करना।
• मिट्टी को ट्राईकोडरमा जैव फंफूदनाशी से उपचारित कर मृदा परीक्षण करा कर ही सही खाद उवर्रक पोषक तत्वों को प्रयोग में लाना चाहिए।

गन्ने का उकटा रोग ( विल्ट) : इसे गन्ने का सूखा रोग भी कहते है। यह सिफैलो स्पोरियम फंफूदी जनक
के कारण होता है।

गन्ने का उकटा रोग के लक्षण :
• संक्रमित गन्ने की ऊपरी पत्ती सूखने लगती है।
• पत्तियों पर सफेद-भूरे धब्बे पड़ जाते हैं।
• यदि गन्ने को नोड से तोड़ते हैं तो टूटता नही लचक जाता है।
•  गन्ने के अन्दर से लाल मटमैली धारियां दिखाई देती है जिनमें कोई गन्ध नहीं आती।
• यह गन्ने की फसल में अक्टुबर से फसल के अंत तक लगता है।

गन्ने का उकटा रोग के उपचार हेतू :
• रोगी पोधो के मेड़ को उखाड़ कर वहां ब्लिचिगं पाउडर डाल दिया जाना चाहिए।
• फसल चक्र अपना कर रोगरोधी किस्मों का चयन करें।
• जुलाई के मध्य में नीम केक 15-20 कुं/हैं की दर से फसल से लगा कर मिट्टी चढ़ाएं।
• अगस्त में क्युनालफॉस 25 ई. सी. 5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल में लगाएं।
• स्वस्थ बीज का चयन कर बीज गन्ने के टुकड़ों को बावस्टिन के 0.25 प्रतिशत घोल में 30 मिनट तक डुबोकर बुवाई करना चाहिए।
• बीज गन्ने को आर्द वायु उष्मोपचार संयंत्र में 54 डिग्री से० पर 2.5 घटे तक उपचारित कर बुवाई करना।
• मिट्टी को ट्राईकोडरमा जैव फंफूदनाशी से उपचारित कर मृदा परीक्षण करा कर ही सही खाद उवर्रक पोषक तत्वों को प्रयोग में लाना चाहिए।

गन्ने का कण्डुआ रोग ( स्मट ) : यह रोग अस्टीलागो सिटामिनी फंफूद जनक है। यह गन्ने की फसल में बुवाई के 2-3 माह लगकर फसल की बढ़ोत्तरी को नुक्सान पहुंचाता है।

कण्डुआ रोग के लक्षण : 
• फसल के शुरुआत में ही 2-3 महिने में दिखाई देता है।
• संक्रमित पौधे की पत्तियां सुख कर काली पड़ कर चमक दिखाई देती है।
• संक्रमित पौधे के पौधे की पत्तियों पर काले भूरे धब्बे पड़ जाते हैं।
• अपने अनुकूल परिस्थितियों में पूरी फसल के प्रत्येक पौधे को संक्रमित कर क्षति पहुंचाता है।
• यह अप्रेल से जून तथा अक्टुबर से नवम्बर तक रोग का अधिक प्रकोप होता है।

कंण्डुआ रोग के उपचार हेतु :
• रोगी पोधो के मेड़ को उखाड़ कर वहां ब्लिचिगं पाउडर डाल दिया जाना चाहिए।
• फसल चक्र अपना कर रोगरोधी किस्मों का चयन करें।
• जुलाई के मध्य में नीम केक 15-20 कुं/हैं की दर से फसल से लगा कर मिट्टी चढ़ाएं।
• अगस्त में क्युनालफॉस 25 ई. सी. 5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल में लगाएं।
• स्वस्थ बीज का चयन कर बीज गन्ने के टुकड़ों को बावस्टिन के 0.25 प्रतिशत घोल में 30 मिनट तक डुबोकर बुवाई करना चाहिए।
• बीज गन्ने को आर्द वायु उष्मोपचार संयंत्र में 54 डिग्री से० पर 2.5 घटे तक उपचारित कर बुवाई करना।
• मिट्टी को ट्राईकोडरमा जैव फंफूदनाशी से उपचारित कर मृदा परीक्षण करा कर ही सही खाद उवर्रक पोषक तत्वों को प्रयोग में लाना चाहिए।

गन्ने की पत्तियां

गन्ने का पोक्खा रोग ( पोक्खा बोइंग ) :
 पोक्खा बोइंग गन्ने का फंफूद जनक रोग है। जो गन्ने की फसल में बढ़ोतरी और पैदावार को नुक्सान पहुंचाता है ।

पोक्खा बोइंग के लक्षण :
• पोक्खा बोइंग का प्रकोप जूलाई से अक्टुबर के मध्य अधिक बढ़ जाता है।
• संक्रमित गन्ने की शीर्ष पत्तियां पीली व सफेद होने के बाद लाल भूरे रंग के होकर टूट जाती है।
• संक्रमित गन्ने का शीर्ष भाग पतला होकर खत्म हो जाता है।
• संक्रमित गन्ने की उपरी पत्तियां आपस में लिपटे हुए होती है।
• संक्रमित गन्ने की उपरी पत्तियां सिकुड़ कर सुखने लगती है। 
• पौधे की वृद्धि रूक जाती है।

गन्ने का पोक्खा रोग उपचार हेतु :
• रोगी पोधो के मेड़ को उखाड़ कर वहां ब्लिचिगं पाउडर डाल दिया जाना चाहिए।
• फसल चक्र अपना कर रोगरोधी किस्मों का चयन करें।
• प्रति एकड़ कॉपर ऑक्सी क्लोराइड (बालिटाक्स, ब्लू कॉपर) को 300 ग्राम 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
• जुलाई के मध्य में नीम केक 15-20 कुं/हैं की दर से फसल से लगा कर मिट्टी चढ़ाएं।
• अगस्त में कॉपर ओक्सीक्लोराइ 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। 
• स्वस्थ बीज का चयन कर बीज गन्ने के टुकड़ों को बावस्टिन या कार्बनडाजिम के 0.25 प्रतिशत घोल में 30 मिनट तक डुबोकर बुवाई करना चाहिए।
• बीज गन्ने को आर्द वायु उष्मोपचार संयंत्र में 54 डिग्री से० पर 2.5 घटे तक उपचारित कर बुवाई करना।
• मिट्टी को ट्राईकोडरमा जैव फंफूदनाशी से उपचारित कर मृदा परीक्षण करा कर ही सही खाद उवर्रक पोषक तत्वों को प्रयोग में लाना चाहिए।

गन्ने का घासीय प्ररोह रोग ( ग्रासी शूट ) : यह फाइटोप्लाज्मा नामक जिवाणु जनित रोग है। यह गन्ने का पत्तियों का पीत रोग से भी जाना जाता है।

घासीय प्ररोह रोग के लक्षण :
• पत्ती झुन्डो में निकलती हैं और अधिकतर पेड़ी फसल को नुक्सान करती है।
• संक्रमित गन्ने की पत्तियों में अचानक से फुटाव होकर झाड़ू के आकार में आ जाती है।
• रोगी पौधे से पतले पतले प्ररोह निकलने लगते हैं।
• रोगी पौधे की पत्तियां सफेद पीलेपन में होकर छोटी हो जाती है।
घासीय प्ररोह रोग के उपचार हेतु :
• स्वस्थ बीज का चयन कर बीज गन्ने के टुकड़ों को बावस्टिन या कार्बनडाजिम के 0.25 प्रतिशत घोल में 30 मिनट तक डुबोकर बुवाई करना चाहिए।
• बीज गन्ने को आर्द वायु उष्मोपचार संयंत्र में 54 डिग्री से० पर 2.5 घटे तक उपचारित कर बुवाई करना।
• रोगी पोधो के मेड़ को उखाड़ कर वहां ब्लिचिगं पाउडर डाल दिया जाना चाहिए।
• फसल चक्र अपना कर रोगरोधी किस्मों का चयन करें।

धन्यवाद। आशा करते हैं कि आपको यह लेख से जानकारियां मिली हैं। हमारी त्रृटि अपने सुझाव तथा मार्गदर्शन आदि के लिए हमें लिखें updateagriculture@gmail.com





Wednesday, 18 March 2020

भारतीय फसलों के मौसम व प्रकार : खरीफ, रबी और जायद



  • नमस्कार । मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आज हम भारतीय कृषि मौसम में मौसम के बारे में जानकारी साझा कर रहे हैं। 

भारत में फसलों का मौसम व प्रकार : खरीफ, रबी और जायद 
भारत की फसलें ऋतुओं के आधार पर ही उगाई जाती है। खरीफ ऋतु, रबी ऋतु और जायद है। जिनमें दो प्रमुख फसल मौसम खरीफ मौसम और रबी मौसम हैं जो मानसून पर निर्भर करते हैं।  रबी और खरीफ मौसमों के बीच एक छोटा मौसम होता है जिसे ज़ैद (जायद) का मौसम कहा जाता है।  इन मौसम में पैदा होने वाली फसलें पानी की उपलब्धता और दिन की रोशनी की मात्रा से संबंधित होती हैं। भारत में उत्पादित कृषि फसलें प्रकृति में मौसमी हैं और मॉनसून पर अत्यधिक निर्भर हैं। 
खरीफ का मौसम : खरीफ की फसलों को ग्रीष्मकालीन फसलों के रूप में भी जाना जाता है। धान की फसल इसकी मुख्य फसल है। बरसात के मौसम में खरीफ की फसलों की बुवाई जून से शुरू होकर कटाई सितंबर तक पहुंचती है। 
मुख्य फसलें : धान, बाजरा, मक्का , गन्ना, ज्वार,  सोयाबीन, उड़द, जून , मूंग ,अरहर, कपास इत्यादि। 
नोट : महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश , पश्चिम बंगाल तमिलनाडु, असम , उड़िसा , आंध्र प्रदेश , केरल विधानसभा बिहार के तटीय क्षेत्र महत्त्वपूर्ण  चावल उत्पादक राज्य है। 
रबी का मौसम :
सर्दियों में बुवाई , वसंत में कटाई
 रबी की फसलों को सर्दी के शुरुआती दिनों में बुवाई की जाती है। आमतौर पर रबी फसलों की बुवाई अक्टुबर से लेकर नवंबर तक और दिसम्बर के मध्यम तक होती है। जिनमें छोटे दिन ओर कम बरसात कम सिंचाई फसल के जमाव व बढ़ोतरी के लिए अच्छा रहता है। रबी की फसल में गेहूं मुख्य फसल में आती है। 
मुख्य फसलें : गेहूं , सरसों , जौ , जई , चना , मटर , प्याज , आलू , पालक , मेन्थी , राई इत्यादि। 
नोट : पंजाब , हरियाणा , हिमाचल प्रदेश , जम्मू और कश्मीर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश , राजस्थान, उत्तराखंड  रबी फसलों के महत्वपूर्ण उत्पादक हैं।
जायद का मौसम :  फसल बुवाई का समय मार्च ,फसल कटाई मई व जून के मध्यम तक होती है। जायद की फसल अधिकतर वर्षा पर निर्भर करती है। जिसकी बुवाई करने के लिए मानसून का  इंतजार ना कर के अन्य सिंचाई के साधनों के माध्यम से करना चाहिए। जायद की फसलों के जमाव व बढ़ोतरी के लिए गर्म दिन के साथ अधिक सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है। जायद की फसलों में मक्का व गन्ना मुख्य फसल है। 
मुख्य फसलें :  मक्का , गन्ना , सूरजमुखी , तरबूज, खीरा , ककड़ी , सब्जियां और चारा फसलें इत्यादि। 
नोट : तमिलनाडु , उत्तर प्रदेश , पंजाब , हरियाणा , गुजरात , मध्य प्रदेश जायद फसलों के महत्वपूर्ण उत्पादक हैं।
धन्यवाद। 

Monday, 16 March 2020

फसल पद्धति

फसल पद्धति 
फसल उत्पादन में वृद्धि करने के लिए किसान को फसल पद्धति के अनुसार निश्चय समय में विभिन्न तरीके से फसलों को उगा सकते हैं । फसल पद्धति के अंतर्गत आने वाले तथ्यों को निम्न लिखे लेख से समझ सकते हैं 

1. एक कैलेंडर वर्ष में एक ही भूमि पर दो या दो से अधिक फसलें उगाना कहते हैं - एकाधिक फसल

 2. निश्चित पंक्ति व्यवस्था के साथ 2 या अधिक फसलों को एक साथ उगाना - इंटर क्रॉपिंग कहलाता है

3. साल-दर-साल जमीन के एक टुकड़े पर केवल एक ही फसल उगाना -मोनो क्रॉपिंग कहलाता है

4. एक खेती वर्ष में भूमि के एक ही टुकड़े पर कम या अधिक फसलों को उगाना - अनुक्रमिक फसल कहलाता है
5. खरीफ और रबी के मौसम के बीच की फसलों को उगाने को कहा जाता है - जायद फसल 

6. ऐसी फसलें जो मुख्य रूप से मिट्टी को ढकने के लिए उगाई जाती हैं और नमी बनाये रखना और क्षरण को कम करने के लिए उगाई जाती है - कवर फसल कहलाती हैं

7. उत्तर पूर्वी क्षेत्र के पहाड़ी इलाक़ों में कटाई और जलाने की खेती को कहा जाता है - झूम / खेती को स्थानांतरित करना

8. एक ही भूमि पर एक ही समय में विभिन्न ऊंचाइयों की फसलों को एक साथ उगाने की प्रणाली को कहा जाता है- मैल्टी मंजिला फसल
मल्टी मंजिला क्रॉपिंग का उदाहरण है - नारियल + काली मिर्च + कोको + अनानास